उच्च न्यायालय ( High Court )

 उच्च न्यायालय 

संविधान के भाग 6 मे, अध्याय 5 मे तथा अनुच्छेद 214 से 231 तक मे उच्च न्यायालय के बारे मे प्रावधान किया गया है । संविधान के अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा, लेकिन अनुच्छेद 231 के अनुसार  संसद विधि द्वारा दो या अधिक राज्यो के लिए अथवा दो या अधिक राज्यो और किसी संघ राज्य क्षेत्र के लिए एक ही उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है । 

वर्तमान समय मे देश मे कुल 25 उच्च न्यायालय है ।

उच्च न्यायालय का गठन   

प्रत्येक उच्च न्यायालय का गठन एक मुख्य न्यायाधीश तथा ऐसे अन्य न्यायाधीशो को मिलाकर किया जाता है, जिन्हे राष्ट्रपति समय समय पर नियुक्त करें (अनुच्छेद 216) । इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है । उच्च न्यायालय मे न्यायाधीशो की कोई नियत संख्या निर्धारित नहीं है ।  इस प्रकार भिन्न भिन्न उच्च न्यायालयों मे न्यायाधीशो की संख्या भिन्न है । उदाहरण के लिए मणिपुर एवं मेघालय उच्च न्यायालय मे न्यायाधीशो की संख्या सबसे कम 3 - 3 है, जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय मे न्यायाधीशो की संख्या सबसे अधिक 160 (स्वीकृत) है । भारत के सभी उच्च न्यायालयों मे कुल 1079 न्यायाधीश होने चाहिय ।  

न्यायाधीशो की योग्यता - 

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप मे नियुक्त होने के लिए किसी व्यक्ति मे निम्नलिखित योग्यता की अपेक्षा की जाती है - 

1. वह भारत का नागरिक हो ।

2. वह कम से कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुका हो अथवा 

3. वह किसी उच्च न्यायालय मे या एक से अधिक उच्च न्यायालय मे लगातार 10 वर्ष तक अधिवक्ता के रूप मे कार्य कर चुका हो अथवा 

4. वह राष्ट्रपति की राय मे एक पारंगत विधिवेत्ता हो । 

उच्च न्यायालय के न्यायाधीशो की नियुक्ति 

उच्च न्यायालय के मुख्य  न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं संबन्धित राज्य के राज्यपाल से विचार विमर्श करने के पश्चात की जाती है । अन्य न्यायाधीशो की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश से, उस राज्यपाल से तथा संबन्धित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके  की जाती है (अनुच्छेद 217) । इस सम्बन्ध मे यह प्रक्रिया अपनायी जाती है कि उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राज्यपाल के पास प्रस्ताव भेजता है और राज्यपाल उस प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री से परामर्श करके उसे प्रधानमंत्री के माध्यम से राष्ट्रपति को भेजता है । राष्ट्रपति उस प्रस्ताव पर भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके न्यायाधीश की नियुक्ति करता है । उच्चतम न्यायालय के एक पूर्व निर्णय के अनुसार राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की राय मानने के लिए बाध्य नहीं है,लेकिन अक्टूबर 1993 के उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए एक निर्णय के अनुसार राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को वरीयता देनी चाहिय ।    

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति

संविधान के अनुच्छेद 223 के अनुसार कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश को नियुक्त करने के सम्बन्ध मे प्रावधान किया गया है, जिसके अनुसार जब कभी भी मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो या मुख्य न्यायाधीश अपने कर्तव्यो का पालन करने मे असमर्थ हो अथवा उसने स्वंय त्यागपत्र दे दिया हो, तो राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के न्यायाधीशो मे से किसी भी न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश के कर्तव्यों का पालन करने के लिए नियुक्त कर सकता है । 

अपर एवं कार्यकारी न्यायाधीशो की नियुक्ति 

संविधान के अनुच्छेद 224 मे यह प्रावधान किया गया है कि जब किसी उच्च न्यायालय मे कार्य की अस्थाई वृद्धि हो जाये और राष्ट्रपति को यह प्रतीत हो कि कार्य निपटाने के लिए और अधिक न्यायाधीशो की आवश्यकता है, तब राष्ट्रपति न्यायाधीश के रूप मे नियुक्त किये जाने वाले किसी योग्य व्यक्ति को 2 वर्ष तक की अवधि के लिए अपर न्यायाधीश के रूप मे नियुक्त कर सकता है ।

 इसी प्रकार जब  कभी कोई  न्यायाधीश का पद रिक्त हो या  न्यायाधीश अपने कर्तव्यो का पालन करने मे असमर्थ हो अथवा उसने स्वंय त्यागपत्र दे दिया हो, तो राष्ट्रपति न्यायाधीश के रूप मे नियुक्त किये जाने वाले योग्य किसी व्यक्ति को कार्यकारी  न्यायाधीश के रूप मे  नियुक्त कर सकता है । 

पढे - उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के बारे मे - Click करें -

सेवा निवृत्त न्यायाधीशो की नियुक्ति 

संविधान के अनुच्छेद 224 के अनुसार उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश किसी समय राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से ऐसे व्यक्ति को, जो किसी भी उच्च न्यायालय मे न्यायाधीश के पद पर कार्य कर चुका हो, उच्च न्यायालय मे न्यायाधीश के रूप मे नियुक्त करने का अनुरोध कर सकता है । 

न्यायाधीशो द्वारा शपथ ग्रहण 

संविधान के अनुच्छेद 219 मे उच्च न्यायालय के न्यायाधीशो की शपथ के बारे मे प्रावधान किया गया है । इसके अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशो को शपथ राज्यपाल द्वारा दिलायी जाती है ।

न्यायाधीश निम्नलिखित के लिए शपथ ग्रहण करते है -

1. विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा के लिए, 

2. भारत की प्रभुतता तथा अखंडता को अक्षुण रखने के लिए ,

3. सम्यक प्रकार से श्रद्धापूर्वक तथा अपनी पूरी योग्यता, ज्ञान और विवेक से अपने पद के कर्त्ताव्यों का भय या पक्षपात अनुराग या द्वेष के बिना पालन करने के लिए, तथा 

4. संविधान एवं विधियों की मर्यादा बनाये रखने के लिए ।

न्यायाधीशो का वेतन 

 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशो के वेतन तथा भत्तो को निर्धारित करने की शक्ति संसद को दी गयी है । वर्तमान मे मुख्य न्यायाधीश का वेतन 2,50,000 हजार रु. प्रतिमाह एवं अन्य न्यायाधीशो का वेतन 2,25,000 रु. प्रतिमाह है । समस्त वेतन एवं भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते है । संविधान के अनुच्छेद 221 के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशो के वेतन, भत्तो एवं विशेषाधिकारों मे उनकी नियुक्ति के पश्चात कोई ऐसा परिवर्तन नहीं किया जाएगा, जो उनके लिए अलाभकारी हो । 

न्यायाधीशो की पदावधि 

अनुच्छेद 217 के अनुसार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीश 62 (65 वर्ष प्रस्तावित) वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते है । किन्तु 62 वर्ष की आयु पूर्ण करने से पूर्व भी वह राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र देकर पद मुक्त हो सकते है अथवा उन्हे सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर संसद के दोनों सदनो द्वारा महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा पद से हटाया जा सकता है ।  

उच्च न्यायालय के न्यायधीशों को उनके पद से उसी आधार एवं रीति से पद से हटाया जा सकता है जिस आधार एवं रीति से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशो को उनके पद से हटाया जाता है । 

विधि व्यवसाय पर रोक  

अनुच्छेद 220 के अनुसार उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश सेवा निवृत्ति के पश्चात उस न्यायालय मे जिससे वह सेवा निवृत्त हुआ हो या अधीनस्थ किसी भी न्यायालय मे वकालत नहीं कर सकता है किन्तु वह किसी दूसरे उच्च न्यायालय मे या उच्चतम न्यायालय मे वकालत कर सकता है । 

न्यायाधीशो का स्थानांतरण - 

संविधान के अनुच्छेद 222 के अनुसार राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से किसी भी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण दूसरे उच्च न्यायालय मे कर सकते है ।  

उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना -

अनुच्छेद 215  में उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय (Court of Record) के रूप में कार्य करता है तथा अपनी अवमानना ( Court of Contempt) के लिए दण्ड भी दे सकता है ।

 उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार 

1. प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार - उच्च न्यायालय को राजस्व तथा राजस्व संग्रह के सम्बन्ध मे, न्यायालय की अवमानना, तलाक विवाह आदि के सम्बन्ध मे प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है । 

समवर्ती प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार - मूल अधिकारों को प्रवर्तित करने के लिए उच्च न्यायालय के पास समवर्ती प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार है . इन अधिकारों को लागू करने के लिए उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अधीन 5 प्रकार की याचिका ( Writ ) बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, उत्प्रेक्षण, प्रतिषेद एवं अधिकार पृच्छा जारी कर सकता है .

2. अपीलीय क्षेत्राधिकार - 

उच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ सभी न्यायालयों तथा न्यायाधिकरणों के निर्णय, आदेशो तथा डिक्रियों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है । 

3. अंतरण सम्बन्धी अधिकार - 

संविधान के अनुच्छेद 228 के अनुसार यदि उच्च न्यायालय को यह समाधान हो जाये कि अधीनस्थ न्यायालय मे लम्बित किसी वाद मे संविधान की व्याख्या के बारे मे कोई प्रश्न न्यायालय के विचाराधीन है, जिसका उस मामले से सम्बन्ध है तो वह उस मामले को अपने पास मंगा सकता है और उस मामले मे निर्णय कर सकता है । इसके अतिरिक्त उच्च न्यायालय अपने किसी अधीनस्थ न्यायालय मे लम्बित वाद को किसी अन्य अधीनस्थ न्यायालय मे अंतरित कर सकता है । 

 अधीक्षण क्षेत्राधिकार 

संविधान के अनुच्छेद 227 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपनी अधिकारिता के अधीन स्थित सभी न्यायालयों तथा अधिकरणो के अधीक्षण की शक्ति प्राप्त होती है । 

उच्च न्यायालय एवं उनकी अधिकारिता 

वर्तमान मे निम्नलिखित उच्च न्यायालयों के अंतर्गत एक से अधिक राज्य एवं संघ शासित राज्यो की अधिकारिता आती है, जो इस प्रकार है -

     उच्च न्यायालय                                  अधिकारिता 

1. पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय - पंजाब, हरियाणा, 

                                                             चंडीगढ़ 

2. केरल उच्च न्यायालय   -                   केरल एवं लक्षद्वीप 

3. बम्बई उच्च न्यायालय   -                 महाराष्ट्र, गोवा एवं 

                                                    दादर और नागर हवेली

4. कलकत्ता उच्च न्यायालय   -        पश्चिम बंगाल, अंडमान 

                                                  एवं निकोबार द्वीप समूह 

5. मद्रास उच्च न्यायालय     -              तमिलनाडू एवं पुंडुचेरी

6. गोवाहटी उच्च न्यायालय  -            असम, अरुणाचल

                                              प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम  

7. जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय   -   जम्मू एवं कश्मीर, 

                                                         लद्दाख 

उच्च न्यायालय  से संबन्धित महत्वपूर्ण तथ्य 

गोवाहटी उच्च न्यायालय  मे सर्वाधिक 4 राज्यो की अधिकारिता आती है ।

देश मे स्थापित होने वाले पहले उच्च न्यायालय कोलकाता  मद्रास एवं बम्बई उच्च न्यायालय है जिनकी स्थापना लॉर्ड कैनिंग के कार्यकाल मे 1862 मे की गयी थी । 

कोलकाता उच्च न्यायालय  की स्थापना 2 जुलाई 1862 को, मद्रास उच्च न्यायालय की स्थापना 5 अगस्त 1862 को एवं बम्बई उच्च न्यायालय की स्थापना 14 अगस्त 1862 को की गयी थी । 

सबसे अंत मे स्थापित उच्च न्यायालय आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय  है जिसकी स्थापना 1 जनवरी 2019 को अमरावती मे की गयी । इस प्रकार वर्तमान मे उच्च न्यायालय की कुल संख्या 25 हो गयी है ।

23 मार्च 2013 को मेघालय, 25 मार्च 2013 को मणिपुर एवं 26 मार्च 2013 को त्रिपुरा उच्च न्यायालय   की स्थापना की गयी थी । 

दिल्ली एक मात्र ऐसा संघ शासित प्रदेश है जिसकी अपना उच्च न्यायालय  है ।

किसी भी उच्च न्यायालय  (हिमाचल प्रदेश) की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश लीला सेठ है । 

बंध को असंवैधानिक घोषित करने वाला देश का पहला उच्च न्यायालय  केरल उच्च न्यायालय  है । 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय  की स्थापना 1866  मे की गयी थी तथा इसकी खण्डपीठ लखनऊ मे स्थित है ।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय मे वर्तमान मे स्वीकृत न्यायाधीशो की संख्या 160 है जो सभी राज्यो मे सर्वाधिक है ।


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